काली पंक्ति के दो अक्षर
तुम सुन्दर से लिख तो देना,
मेरे नन्हे से अरमान के आसू,
को वक़्त मिले तौ पूछ तो देना!
कहने में ऐतराज़ नहीं,
पर शर्म न सीमा फांड रही?
अमिट अक्षर के अफसाने,
लिखने से ही शुंरुआत सही.
आवाज़ न दो,पर सुन लेता हूँ,
धहद्कन कहीं जो दूर बजी,
पास आओ तो थम सी जाती,
मेरी ही धहद्कन,क्या खूब रही?
डूबा डूबा बेगानों में,
तुम्हे दूधता पैमानों में.
आखिरआखिर एक बार बना दे,
सपनों के कुछ महल सही!
..ankur