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Saturday, March 29, 2008

Just a Thought....

The Light when mixes with Air gives life to Living Beings,rather the same Light when mixes with Vacuum gives life to whom/what?Is this discontinuity of light in nature with varying substances paves way to a new theory?
L+A=Life^+O
L+V=?(x) +P

or,

A-V=Life-x+O-P
or,
x=Life+(V-A)+O-P
Let V and A be expressed in one assumed Universal Parameter Y*.
so,
v=f(Y) +M
and a=f1(Y) +N
Integrating with limits from 0 to V and A.(Limiting the substance in picture).
vdv=f(Y)dv+Mdv
(V.V)/2=f(Y)V+MV
V{V/2-f(Y)-M}=0
if,V is not equal to Zero,(It can not be Zero)*
V=2{f(Y)+M}
Similarily we can drive,
A=2{f1(Y)+N}


Putting these Values in the initially dreived equation.(we are trying to find x)
x=Life+(V-A)+O-P
or,
x=Life+[{2(f(Y)-f1(Y)+M-N)}+O-P] or, x=Life+Z
Now Three Possibilities arises:-
1. Z=0
2.Z>0
3.Z<0


IN ANY CASE,Y IS ONE OF THE DECIDING FACTORS.WE CAN ASSUME THAT VALUE OF Y CAN BE PUT BETWEEN 0 TO 1.
Anyways,The mathematics above clears the dust that there can be life beyond earth.

...............ankur





^Quantifying Life.
*We define the Universe made of different things like Vacuum,air pertaining to a common substance Y.

facts of future....

"Forget the old FACTS and buy your own THOUGHTS to let it become the facts of future"

.................Ankur

मदिर हुआ राष्ट्र-प्रेम मेरा।

मदिर हुआ राष्ट्र-प्रेम मेरा।
सुन वीरों की गाथाएँ।
फिर कौन रोमाचित न होगा,
की,शिवाजी किसी के हाथ न आए।

भगत सिंह और राजगुरु,
के बलिदानों की खुशबू,
आज भी महक जाती है,
जैसे कल ही खिली हो सरसों।

गाँधी,नेहरू हमें सिखातें,
कोटी मंत्रों का सार बताते।
की सय्यम और सेवा ही सच है,
मार्ग सत्य का हमें dikhatain।

विवेकानन्द सा प्रगर ज्ञानी,
अभूत बुद्धि का था सानी,
वेदों की चमक से,
जग को चमकाने।
वह निकला था जो लाठी ताने।

..........अंकुर

विकट समय की चाल अधूरी

विकट समय की चाल अधूरी,
चले मन की शक्ति से ही।
बोध जानना कठिन बहुत है,
भीतर छुपी इस गति की।

वेदों से सब सीखा है हमनें,
क्या अर्थवेद क्या सामवेद,
एक भाषा में ज्ञात कराते,
की भारत है अनेकों मैं एक।

नन्हें कन्हैय्या की लीलायें,
और माँ यसोदा का प्यार,
शांत करता भुजे मन को,
जो तत्पर जाने को उस पार।

प्रथक-प्रथक श्लोकों के स्वर,
नित भव्य करते भारत भूमि को।
सितार की तान,और तबले का अष्टक,
नाचे सागर भी,सुन इस ध्वनि को।

.........अंकुर

रक्त संगत भूल भुलय्या

रक्त संगत भूल भुलय्या,
है वीरता की अगर इमारतें,
विरक्ति संगत नियमावली,
भी चले है तौ साथ में।

मन्दिर,मस्जिद या हो गुरद्वारे,
करे वंदना साथ में।
भव्य भारत गर्वित होता।
आनंदित है सह-वास में।

प्रतिसाद ही तो है प्रभु तेरा,
की पवन छुए हर छोह्र यहाँ।
नित्य नृत्य है करती मदमस्त,
क्या वसंत हो पतझर ही क्या?

नमन मेरा इस निर्माण को,
विविधता की इस मिसाल को।
कथन अहम् से है भरता,
जय भव्य भारत की भूमि को।

..............अंकुर

निशब्द कुञ्ज भारती,

निशब्द कुञ्ज भारती,

निबंध नियत पुकारती.

अक्षुण अजर,ध्वज विरल,

चले पग पथोंनती.


विशाल राज्य,असीम पथ,

असंख्य कोटी सारथी,

लिए चले वह ध्वज जरा,

है विश्व को ललकारती.


पग बाधा तिनके सी लगे,

ऊँची भुकुत,चमके ललाट.

सुप्त सोती पंक्तियाँ,

वैद जले,दीपक से आज.


नियम प्रथम और सत्यम,

सदाचरण की जागृति,

सन्देश देती ज्वाला मेरी.

जे जननी प्रखारती।

..............अंकुर